Ramchandra Shukla Rachnavali: Volumes 1 - 8
आचार्य शुक्ल कोरे साहित्य समालोचक नहीं थे। वे गम्भीर अर्थों में साहित्य के समालोचक थे, जहाँ साहित्य के अन्तर्गत जीवन की चिन्ता, समाज की चिन्ता और पूरी संस्कृति की चिन्ता रहती थी। यह हिन्दी आलोचना का सौभाग्य है कि उसकी प्रतिष्ठा एक ऐसे समालोचक द्वारा हुई जो शुद्ध साहित्यिक आलोचक नहीं था, सिर्फ़ अलंकार और रस की मीमांसा करनेवाला काव्य-विवेचक नहीं था, बल्कि साहित्य को व्यापक सामाजिक सन्दर्भों में देखनेवाला और साहित्य की सामाजिक सार्थकता की प्रतिष्ठा करनेवाला आलोचक था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल दुनिया के अनेक महान आलोचकों के समान ही भारत के पहले गम्भीर समालोचक दिखाई पड़ते हैं। आचार्य शुक्ल अपना चिन्तन साहित्य की सामाजिक सार्थकता और साहित्य में ‘लोक मंगल’ के व्यापक सन्दर्भ में करते हैं, तो स्वभावतः उनके व्यापक, विराट व्यक्तित्व की ओर हमारा ध्यान जाता है। उनके समग्र कृतित्व का संकलन हिन्दी साहित्य की परम्परा के सर्वश्रेष्ठ के पुनर्जीवन की तरह है। आठ खंडों में प्रकाशित ‘रामचन्द्र शुक्ल रचनावली’ के पहले खंड में उनकी सर्वाधिक चर्चित और कालजयी कृति ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ संकलित है। रचनावली के सम्पादक नामवर सिंह ने इसकी भूमिका में आचार्य शुक्ल की इस कृति के महत्त्व और उसकी विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की है।
Variants (1)
- Default Title — 3000.00 INR — In stock
How AI sees this product
The more complete this product's details, the more confidently AI assistants can understand and recommend it.