Sanskrit Rachna Prakash संस्कृत- रचना- प्रकाश

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Sanskrit Rachna Prakash संस्कृत- रचना- प्रकाश हरिदास संस्कृत सीरीज 237 'लेखक' - साहित्यतीर्थ, साहित्यरत्न पं० रमाकान्त द्विवेदी एम. ए. अध्यापक, डिग्री कालेज, सीतामढ़ी चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी Packing and Handling Charge - Rs 45 संस्कृत-रचना का साधारण परिचय रचना :- 'रच प्रतियत्ने' धातु से 'रचना' शब्द निष्पन्न हुआ है। इसका साधारण अर्थ है निर्माण या बनाना । किसी भाषा में रचना से 'वाक्यों की रचना' का अभिप्राय है। किसी भी निर्माण के लिये कुछ निश्चित तथा समुचित उपादान (कारण, सामग्री) होते हैं । भाषा रचना के उपादान ६ हैं शब्द । इसलिए नियमानुकूल विचार- पूर्वक सङ्कलित शब्दों को विभक्ति आदि के योग से यथोचित रूप-परिवर्तन के साथ परस्पर-समन्वित तथा क्रमिक रूप में रखना, जिससे एक पूर्ण-भाव का प्रकाश होता हो, रचना कहते हैं । समन्वय-शब्दों के लिंग, वचन, पुरुष, कारक तथा काल के विषय में परस्पर के सम्बन्ध या समानता को समन्वय कहते हैं। जैसे :- ५. सुशीलः बालकः खेलति सुशील लड़का खेलता है। इस वाक्य में 'सुशील: ' यह शब्द लिङ्ग, वचन, कारक तथा पुरुष के सम्बन्ध में 'बालक:' इस शब्द में समन्वित है; तथा 'खेलति' शब्द वचन तथा पुरुष के सम्बन्ध में 'बालक:' इस शब्द में समन्वित है। संस्कृत की रचना में नीचे के चार प्रकार के मुख्य समन्वयों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। १. क्रिया के साथ कर्त्ता का समन्वय २ संज्ञा के साथ सर्वनाम का समन्वय ३. विशेष्य के साथ विशेषण का समन्वय के ४. सम्बन्धवान् के साथ सम्बन्धवाची का समन्वय ।

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