दोराहे पर दलित
इस किताब में अपने तीन लेखों और सुभाषिनी अली से बातचीत में आनंद तेलतुंबडे ने दलित समुदाय को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों का गहराई से विश्लेषण किया है।वह कहते हैं कि दलितों के एक छोटे तबक़े में समृद्धि आई है, लेकिन उनका बहुसंख्य हिस्सा आज भी बुनियादी अधिकारों से वंचित है। 1990 के दशक से दलित दोतरफ़ा हमले में फंसे हुए हैं — एक तो नव-उदारवादी आर्थिक सुधार और दूसरा हिंदुत्व का उभार। उदारीकरण की नीतियों से उनके सामने रोज़ी-रोज़गार को लेकर असुरक्षा बढ़ी है,वहीं हिंदुत्ववादी ताक़तें उन्हें निशाना बना रही हैं। विडंबना यह है कि दलितों का एक वर्ग, हिंदुत्व समर्थक सत्ता के भ्रमजाल में फंसकर उसके साथ खड़ा हो गया है। आनंद तेलतुंबडे का मानना है कि आंबेडकरी आंदोलन ने धार खो दी है, वहीं वामपंथी आंदोलन भी दिशाहीन हो गया है। पर वक़्त की मांग है कि ये दोनों धाराएं साथ आएं और मिलकर शोषितों-पीड़ितों के लिए संघर्ष करें।
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